मां की स्मृति को बनाया सेवा का संकल्प, डंपी तिवारी(बाबा)बने लाखों के प्रेरणास्त्रोत

Picture of voiceofshaurya@gmail.com

voiceofshaurya@gmail.com

FOLLOW US:

Share

वाराणसी—

समाज सेवा किसी पद या पहचान से नहीं, बल्कि दर्द को करीब से महसूस करने से जन्म लेती है। ऐसा ही जीवन दर्शन अपनाया है शिवकुमार तिवारी उर्फ डंपी तिवारी (बाबा) ने, जो ग्राम मकसूदन पट्टी, ताड़ी बाज़ार, थाना फूलपुर के निवासी और मिशन समाज सेवा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
कर्मस्थली— मां बलाधाम कॉलोनी, लमही पांडेयपुर, वाराणसी।

दर्द जिसने बदली सोच, बदला जीवन

डंपी तिवारी का यह सेवाभाव किसी साधारण भावना से नहीं, बल्कि एक गहरे पारिवारिक संघर्ष से शुरू हुआ। वर्ष 2005 में उनकी मां को कैंसर हुआ।लंबी बीमारी,अस्पतालों के चक्कर, मानसिक और आर्थिक दबाव इन सबने उनके जीवन की दिशा बदल दी। 1 अगस्त 2011 को उनकी मां का निधन हो गया। उसी कठिन दौर में उन्हें कड़वी सच्चाई समझ आई कि—“दुख में सब साथ नहीं रहते, सच्चा रिश्ता वही होता है जो मुश्किल में आपके लिए खड़ा रहे।”
यही पीड़ा बाद में संकल्प में बदल गई।
इसी संकल्प ने उन्हें समाज सेवा के रास्ते पर आगे बढ़ाया और साल 2018 में ‘मिशन समाज सेवा’ नामक संस्था की स्थापना हुई।

लोगों के लिए संकटों में खड़े होने वाले जनसेवक

डंपी तिवारी की खासियत यह है कि वे केवल त्योहारों या आयोजन में नहीं, बल्कि जहां भी किसी को सहायता की आवश्यकता होती है वे खुद वहां पहुंच जाते हैं।
कई बार आधी रात को मरीजों के लिए दवाएं पहुंचाना, किसी बुजुर्ग को अस्पताल ले जाना, अनाथ बच्चों की मदद करना—ऐसे अनेकों उदाहरण क्षेत्र के लोगों के बीच चर्चा में रहते हैं।
उनका कहना है—“यदि किसी इंसान की मदद करने का अवसर मिलता है तो समझिए भगवान ने आपको उसकी सेवा का माध्यम चुना है।”

इंसानियत को जीवन का लक्ष्य बनाया

पिछले कई वर्षों में डंपी तिवारी ने अपने स्तर पर और संगठन की मदद से ऐसे कार्य किए हैं, जिनसे हजारों लोग लाभान्वित हुए।
उनके प्रमुख कार्यों में शामिल हैं—

1. वृद्धा आश्रमों में सेवा और सहयोग- अकेलेपन से जूझ रहे बुजुर्गों को भोजन, दवाइयाँ, गर्म कपड़े और साथ देने के लिए वे लगातार आश्रमों का दौरा करते हैं। कई बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि “डंपी बेटा आता है तो लगता है घर का कोई अपना आ गया है।”

2. ठंड में जरूरतमंदों को कंबल वितरण- वाराणसी की कड़ाके की सर्दी में फुटपाथों पर सोने वालों के लिए कंबल वितरण अभियान उनका सबसे प्रमुख सामाजिक अभियान रहा है। हर साल सैकड़ों परिवारों तक राहत पहुंचाई जाती है।

3. दिव्यांगजनों के लिए ट्राईसाइकिल और उपकरण-
विकलांगों को वे न सिर्फ ट्राईसाइकिल उपलब्ध कराते हैं बल्कि सरकारी योजनाओं से उन्हें जोड़ने में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। कई परिवारों ने स्वीकार किया है कि “डंपी जी की वजह से हमारे घर का कोई सदस्य पहली बार खुद से चल पाया।

4. कमजोर परिवारों की आर्थिक व चिकित्सीय मदद- किसी की दवा, किसी के बच्चे की पढ़ाई, किसी के घर की समस्या—डंपी तिवारी हर जगह अपनी क्षमता अनुसार मदद पहुंचाने का प्रयास करते हैं।

उनके ये कार्य न केवल प्रभावित लोगों की जिंदगी बदलते हैं, बल्कि समाज में यह संदेश भी देते हैं कि संवेदना और सहयोग अभी भी जीवित है।

युवाओं के लिए प्रेरणा बना डंपी तिवारी का सफर

आज का युवा अक्सर बदलाव की बात करता है, लेकिन शुरुआत नहीं कर पाता। डंपी तिवारी का जीवन इस सोच को तोड़ता है।
वे दिखाते हैं कि—एक व्यक्ति भी समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकता है, अगर वह निस्वार्थ भाव से आगे बढ़े।
उनके संगठन से जुड़कर अब सैकड़ों युवा भी समाज सेवा में हिस्सा ले रहे हैं, जो उनके प्रयासों को और अधिक मजबूत बना रहे हैं।
डंपी तिवारी खुद को कभी नेता या पदाधिकारी नहीं कहते। उनका कहना है— “मैं सिर्फ इंसान की सेवा करने आया हूँ। मां की सीख है कि जिसके पास जो है, उसमें से कुछ दूसरों के लिए जरूर निकाले।”
उनकी यही सादगी और समर्पण ने उन्हें जनता के हृदय में जगह दी है। उनके द्वारा किए गए कार्यों की वजह से आज कई गांवों, बस्तियों और परिवारों में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

उनकी सोच ने बनाया उन्हें लोगों का ‘बाबा’

लोग उन्हें प्यार से “बाबा” क्यों कहते हैं? क्योंकि वे हर पीड़ा में सबसे पहले खड़े नजर आते हैं।
किसी की तकलीफ सुनकर चुप रह जाना उनके स्वभाव में नहीं है।
वे कहते हैं—“मां चली गई, लेकिन उसकी सीख ने मुझे लोगों की मां,पिता, भाई और बेटे जैसा बनना सिखा दिया।”

उनकी कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस विचार की कहानी है जो दर्द में पैदा होता है और समाज की मुस्कान बन जाता है।

 

 

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

Leave a Comment

सबसे ज्यादा पड़ गई