1. मोदी हैं, तो विकास है! : विष्णु नागर
भारत में आजकल ‘विकास ‘ बहुत हो रहा है। पिछले शुक्रवार को एक साथ तीन जगहों का ‘विकास’ स्वयं प्रधानमंत्री ने किया। तीनों जगहों पर उन्होंने अपनी ‘गरिमामय उपस्थिति’ का लाभ दिया। जींद और सोनीपत के बीच देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का उदघाटन किया। उदघाटन आदि करते समय उनके हाथ ‘कर-कमल’ हो जाते हैं। खैर छोड़िए इसे।
जब प्रधानमंत्री की उपस्थिति ‘गरिमामय’ हो, तो केवल ट्रेन को हरी झंडी दिखाने से काम नहीं चलता। उसकी ‘गरिमा’ का सम्मान करने के लिए ‘विकास’ परियोजनाओं का आंकड़ा भी ‘गरिमापूर्ण’ होना चाहिए। यहां वह 15000 हजार करोड़ था!इसे लाख करोड़ की भाषा में कहा जाता, तो प्रधानमंत्री और आंकड़े दोनों की गरिमा का अपमान हो जाता। गूगल के अनुसार यह महज़ 0.15 लाख करोड़ रह जाता!
प्रधानमंत्री ने सोचा कि जब ‘विकास यात्रा’ पर निकले हैं, तो हरियाणा पर आकर क्यों रुक जाएं? तो वे लगे हाथों चंडीगढ़ का भी ‘विकास’ कर आए, ‘विकास के नये युग का सूत्रपात’ कर आए, जबकि ‘विकास’ के ‘नये युग’ का पहले भी न जाने कितनी बार सूत्रपात हो चुका है।
वहां उन्होंने 4700 करोड़ की ‘विकास परियोजनाओं’ का उदघटना और शिलान्यास किया। फिर भी उनका मन नहीं भरा, तो वे जालंधर का भी ‘विकास’ कर आए। वहां उन्होंने 5470 करोड़ की परियोजनाओं का उदघाटन किया। पंजाब के चुनाव नजदीक हैं, तो वहां का ‘विकास’ करना भी उनकी मजबूरी है। ‘ईमानदारी की प्रतिमूर्ति’ प्रधानमंत्री जी ने वहां आम आदमी पार्टी को ‘कट्टर बेईमान’ बताया!

पता नहीं, ये कहां से इतना ‘विकास ‘ले आते हैं, जो मीडिया के विज्ञापनों में रोज दिखाई देता है। सूरज भी कभी बादलों में छुप जाता है, मगर ये अपने ‘विकास’ को कभी बादलों में छुपने नहीं देते! उस पर बादल छा गए तो बरसात हो सकती है, जिससे ‘विकास’ बह सकता है!
शुक्रवार को वह स्वयं तो उत्तर प्रदेश ‘विकास’ करने न जा सके, क्योंकि वहां बालकांड समाप्त हो चुका,अयोध्या कांड चल रहा है, तो योगी आदित्यनाथ ने खुद ही अपने प्रदेश का ‘विकास’ अपने बुलडोजरी ‘कर कमलों’ से कर दिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने पिछले नौ वर्षों में कितने लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव स्वीकार किए हैं, कितने लाख नौकरियां दी हैं और निजी क्षेत्र में विकास के कितने अवसर पैदा किए हैं। इधर अरुणाचल में मुख्यमंत्री पेमा खांडू के नेतृत्व में इतना अधिक ‘विकास’ हुआ है
कि उसके लिए उन्होंने अखबारों के दो पेज खर्च करना उचित समझा! पेमा खांडू जी अपने परिजनों का भी सवा हजार करोड़ से कुछ अधिक का ‘विकास’ करने के लिए प्रसिद्ध हो चुके हैं, जिस तरह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने उज्जैन के विकास के साथ अपने परिजनों का विकास किया! मोदी जी को इससे कोई फ़र्क न कभी पड़ा है, न पड़ता है। मोदी जी को ‘विकास’ शब्द मात्र से इतना प्रेम है कि ‘विकास’ करो, चाहे अपने परिजनों का करो! मोदी जी स्वयं अपना भी ‘विकास’ करते हैं और अपने दो गुजराती परिजनों का भी करना नहीं भूलते!
‘विकास’ वहां होता है, जहां डबल इंजन की सरकार होती है या सिंगल से डबल होने की संभावना होती है। इनका अपना सिंगल इंजन इतना शक्तिशाली नहीं है कि स्वयं विकास कर सके, इसलिए आपने हिमाचल, कर्नाटक, तेलंगाना, केरल आदि का विकास होते हुए नहीं सुना होगा। वहां डबल इंजन नहीं है, तो वहां विकास की गंगा, यमुना, सरस्वती ही नहीं, गोदावरी भी प्रकट नहीं होती!
जहां डबल इंजन की सरकार होती है, वहां मुख्यमंत्री के साथ प्रधानमंत्री के फोटो का भी ‘विकास’ हो जाता है, सिंगल वाले ऐसा नहीं होने देते! इसके अलावा जहां डबल इंजन सरकार होती है, वहां जमीन पर विकास हो न हो, मीडिया में विज्ञापनों का ‘विकास’ अवश्य हो जाता है, जिससे अखबारों की समृद्धि का भी ‘विकास’ हो जाता है। अखबारों का जब इस प्रकार ‘विकास’ होता है, तो वे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की छवि का ‘विकास’ करते हैं। इस प्रकार ‘विकास’ की कड़ियां आपस में जुड़ती जाती हैं।

‘विकास’ से मुझे समस्या नहीं, समस्या यह है कि थोड़ा सा गणित मैंने पढ़ा है, तो मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि ये ‘लाख करोड़’ क्या होते हैं! मुझे लाख समझ में आता है, करोड़ भी थोड़ा प्रयास करने पर समझ में आ जाता है, मगर जब इन दोनों का संगम हो जाता है, ये मिलकर एक या दस लाख करोड़ बन जाते हैं,
तो समझ से परे हो जाते हैं। अभी डंकापति जी राजस्थान को एक लाख करोड़ से अधिक की ‘सौगात’ दे आए और नितिन गडकरी जी उनसे भी आगे बढ़कर उत्तर प्रदेश को पांच लाख करोड़ के विकास कार्यों की घोषणा कर आए। मुझे पूरा विश्वास है कि इन्हें ‘लाख करोड़’ क्या होता है, इसका अर्थ पता होगा, क्योंकि ‘विकास’ का इंजन ये चलाते हैं और भाजपा शासित राज्यों का ‘विकास ‘ इससे नीचे कभी उतरने नहीं देते!
‘विकास’ होता है, तो स्वयंसिद्ध है कि विभिन्न स्तरों पर कमीशन का भी ‘विकास’ होता है। ठेकेदारों के रूप में अपने भाई-भतीजों का भी ‘विकास’ हो जाता है। ठेकेदार मिलकर इंजीनियरों का विकास करवाते हैं, तो इस बहाने एमएलए आदि का भी ‘विकास’ हो जाता है। ये भी ‘विकास’ का सारा लाभ खुद नहीं उठाते, वे इसे ऊपर पहुंचाते हैं और उनसे ऊपर वाले अपने से ऊपर वालों तक पहुंचाते हैं और इस तरह विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का ‘विकास’ हो जाता है।
सड़कों का ‘विकास’ बारह हजार करोड़ का हो या छब्बीस हजार करोड़ का, गड्ढों के ‘विकास’ को प्राथमिकता दी जाती है। जब पुलों का ‘विकास’ किया जाता है, तो उनके गिरने का ‘विकास ‘भी सुनिश्चित किया जाता है, ताकि ‘विकास’ का अविरल प्रवाह बाधित न हो। कुछ पुल तो बनते-बनते ही ‘विकास’ की अवस्था को प्राप्त कर जाते हैं। कुछ धैर्यवान होते हैं, दो-तीन महीने ठहर जाते हैं और कुछ सुपर धैर्यवान होते हैं, साल-दो साल टिककर ‘विकास’ का गौरव बढ़ाते हैं। फिर दस- बीस जानें लेकर ‘विकास’ का क्रिया-करम करवा देते हैं।
माल कम से कम खपाकर और ऊपर से नीचे तक कमीशन पहुंचाकर जो ‘विकास’ किया जाता है, उससे ‘विकास’ के नये विजन का भी ‘विकास’ होता है और ‘विकास के इस नये विजन’ को एक आदमी ने अपनी थाती बना रखा है। आप उसका नाम और काम अच्छी तरह जानते हो। उसका नाम लेकर मैं आपकी बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाना नहीं चाहता!
और जब चहुंमुखी और बहुमुखी ‘विकास’ होता है, तो उससे डंका उत्पन्न होता है, जो दुनिया भर में बजता है। मुझे बताया गया है कि भारत का डंका आजकल विश्व भर में बज रहा है, मगर यह डंका भारत में सुनाई नहीं देता। भारत तो छोड़ो, मुझे दिल्ली में अपने मोहल्ले में सुनाई नहीं देता।
मुझे यह सुनाई नहीं देता, तो सोचा कि हो सकता है यह मेरे कानों की समस्या हो! मैंने अपने कान चेक करवाने से पहले अपने पूरे परिवार से पूछा, फिर अपने दोस्तों से पूछा, फिर अपने दुश्मनों से भी पूछा, तो पता चला कि सबके कान खराब हैं और वे इससे बहुत खुश हैं, वरना ‘विकास’ का डंका उनके कान में घुसकर दिन-रात बजता रहता और उनका दिमाग फट जाता। और दिमाग फट जाता, तो फिर बचता क्या!
2. पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ…! : राजेंद्र शर्मा
थैंक यू मोदी जी, सोनम वांगचुक की जान बचाने के लिए। वर्ना कॉकरोचों ने तो बेचारे लद्दाखी की जान ही ले ली थी। एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, पूरे बीस दिन बेचारे पहाड़ी को भूखा रखा। वह भी दिल्ली की भयंकर गर्मी में। वह भी जंतर-मंतर पर खुले आसमान के नीचे। ऊपर से जब-तब बारिश और। साथ में कई छात्रों को और भूख हड़ताल पर बैठा दिया यानी बंदा उठना भी चाहे, तो भी शर्मी-सौदा बैठा रहे। बच्चे भूख हड़ताल पर बैठे रहें और बुजुर्ग भूख की मार से उठ जाए, तो लोग क्या कहेंगे? इसी चक्कर में बेचारे की जान पर ही बन आयी थी।
वैसे आप जी ने धीरज भी खूब दिखाया। दिल्ली में ऐन अपने सेवा तीर्थ की नाक के नीचे, कॉकरोचों को चार-चार हफ्ते जमा रहने दिया। जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने दिया। धर्मेंद्र बाबू का इस्तीफा मांगते रहने दिया। और भी न जाने क्या-क्या मांगते रहने दिया। तीन-तीन हफ्ते तक भूखे रहने दिया।
145 करोड़ के चुने हुए पीएम ने पूरे बीस दिन तक इंतजार किया! वह तो जब वांगचुक के भूखे रहने का इक्कीसवां दिन लग गया, तो आप जी ने झट पहचान लिया कि अभी नहीं, तो कभी नहीं। फिर क्या था, छेड़ दिया ‘‘ऑपरेशन प्राण रक्षा।’’
शाह जी की पुलिस ने भी झटपट कार्रवाई की। मोदी सरकार की पुलिस है, कोई पिछले जैसी लटकाने, अटकाने, भटकाने वाली, सरकारों वाली पुलिस थोड़े ही है, जो देर लगाती। सुबह तडक़े ही जंतर-मंतर पर धावा बोल दिया। कैमरों को रोकने के लिए टेंपरेरी पर्दा खड़ा किया, कॉकरोचों को धकिया के दूर भगाया, वांगचुक को डंगाडोली कर के उठाया, एंबुलेंस में डाला और सीधे अस्पताल पहुंचा दिया।
इसके बाद, भूख हड़ताल करने वालों की जान बचाने के लिए क्या करना होता है, यह भारत के पुलिस वाले बखूबी जानते हैं। अंगरेजों के जमाने में उनके पुरखों ने बार-बार ऐसे ही प्राण रक्षा करने का काम किया जो था। उनकी आदत का असर पुलिस की अब की पीढिय़ों के खून में है। और कुछ हो न हो, वांगचुक की जान अब कॉकरोचों की वजह से भूखे रहने से नहीं जाएगी।
वैसे एक बात तो माननी पड़ेगी कि मोदी जी सोनम वांगचुक की जान की कुछ ज्यादा ही परवाह करते हैं। अभी पिछले साल ही तो लद्दाख वाले झंझट के टैम पर भी वांगचुक की जान बचायी थी। अगले को एनएसए में गिरफ्तार करना पड़ा तो किया, उदयपुर की जेल में बंद रखना पड़ा तो रखा, पर अगले की जान बचाकर माने। और सात-आठ महीने बाद, जब खतरा टल गया, तो अगले को बिना कोई आरोप लगाए जेल से बाहर भी कर दिया।
हमें तो लगता है कि आप जी के इस तरह बार-बार जान बचाने ने ही सोनम वांगचुक को सिर चढ़ा दिया है। बंदा बार-बार अपनी जान जोखिम में डाल देता है कि आप जी तो बचा ही लोगे। ये फुनसुक वांगडू आप की ममता का बेजा फायदा उठा रहा है जी। और आप जी हैं कि उसे बेजा फायदा उठाने दे रहे हैं। फिर आप जी अगर ऑपरेशन प्राण रक्षा चला ही रहे थे,
तो वांगचुक की ही तरह, बगल में ही भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों को भी उठवा लेते, उनकी भी प्राण रक्षा करा देते। कम से कम विरोधियों को यह प्रचार करने का मौका नहीं मिलता कि मोदी को छात्रों की परवाह नहीं है — बच्चों को ही मरने को छोड़ दिया। अब शाह की जी पुलिस इतनी कमजोर तो नहीं ही हो सकती कि जंतर-मंतर से वांगचुक के साथ तीन-चार भूख हड़ताली छात्रों को भी नहीं उठा पाती।
वैसे इतना तो हम भी समझते हैं कि ये छात्र वगैरह हैं तो इसी तरह के सलूक के काबिल। चार किताबें क्या पढ़ गए, हर बात पर बहस करना चाहते हैं, हर चीज पर सवाल और वह भी आप जी से। अब इन्हें कौन समझाए कि आप जी ने सवाल करना तो उन मीडिया वालों का भी छुड़वा दिया, जिन्हें तनख्वाह ही सवाल करने की मिलती थी, फिर ये बच्चे किस खेत की मूली हैं। मगर ये नहीं समझते। पढ़ाई रुकवा दो, फिर भी नहीं समझते। जेल में डाल दो, फिर भी नहीं समझते। आप जी के मास्टर स्ट्रोक तक को मास्टर स्ट्रोक नहीं समझते हैं, उल्टे विरोध करने के लिए खड़े हो जाते हैं — वामी कहीं के!
अब आप इनकी सुनने लगें, तब तो हो चुकी इस महान देश की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा की वापसी। इन्हें बाबरी मस्जिद तो अब भी याद है, पर संत कबीरदास जी की उतनी ही पुरानी शिक्षा बिल्कुल ही भूल गए हैं। और आप जी की सरकार कबीरदास जी की शिक्षा पर चल रही है, तो ये उसका भी विरोध कर रहे हैं। कबीरदास जी ने तो मुगलों के टैम में कह दिया था — ‘‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, भया न पंडित कोइ’’। कहने को तो आपजी से पहले वालों ने इसे बच्चों की किताबों में रखा था,
रटवाया भी था, पर इस पर चलना नहीं सिखाया था। तभी तो आजादी के बाद से देश कबीरदास जी की शिक्षा से उल्टे रास्ते पर ही चलता रहा। पोथियां कम थीं, पढ़ने की सकत भी लोगों की कम थी, फिर भी गरीब-गुरबा के बीच यह धारणा फैल गयी कि पढ़ेंगे बच्चे, तभी आगे बढ़ेंगे बच्चे! और तो और, जब हर चीज में बाजार आ गई, तो पढ़ाने के धंधे से खूब कमाई भी होने लगी, पर कबीर की शिक्षा पीछे छूटती गयी।
आपजी का ही राज है, जो सचमुच कबीरदास जी की शिक्षा का अनुसरण कर रहा है — पोथी पढ़ने से कोई पंडित नहीं हो जाएगा, जो है, वही का वही रहेगा! पर नेहरू जी के टैम से पड़ी गरीबों की आदत आसानी से कहां छूटती है। आपने कहा भी कि पकौड़ा तलना भी रोजगार है, जिसके लिए पढ़ने की भी जरूरत नहीं है — पर किसी पर कुछ असर पड़ा? फिर खबर आयी कि आप के राज ने करीब एक लाख सरकारी स्कूल बंद करा दिए। फिर खबर आयी कि करीब दो करोड़ बच्चों का स्कूल में दाखिला लेना कम करा दिया।
आपके सबसे प्रिय राज्य में 45 फीसद से ज्यादा बच्चों को बाहरवीं से पहले-पहले पढ़ाई के चक्कर से आजाद करा दिया। शिक्षा पर खर्च हर साल घटा दिया। शिक्षा पर पूरी तरह से आरएसएस का कब्जा करा दिया। बारह साल में 185 परीक्षाओं का पेपर लीक करा दिया। और सुनते हैं, जल्द ही यूजीसी वगैरह की दुकान बंद कराने की तैयारी है। यानी सरकार लोगों को समझाने की हरचंद कोशिश कर रही है कि कबीरदास जी के रास्ते पर चलो, पोथी पढ़ना छोड़ दो! पर आम जन है कि मानता ही नहीं है।
प्राचीन गौरव की पुनर्स्थापना के लिए सरकार को अब और कड़े कदम उठाने ही होंगे। जैसे आजम खान की बनायी अली जौहर यूनिवर्सिटी की कुल चालीस में अड़तीस इमारतों को ढहाना। बख्तियार खिलजी का बदला भी और कबीर की शिक्षा पर अमल भी। और हां! धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हर्गिज नहीं होगा। अलबत्ता शिक्षा मंत्रालय का काम ही खत्म हो जाने से, शिक्षा मंत्री की जरूरत ही खत्म हो जाए, तो बात दूसरी है। वैसे बिना विमान सेवा के उड्डयन मंत्री रह सकता है, तो बिना शिक्षा के शिक्षा मंत्री क्यों नहीं?









Users Today : 31
Users This Year : 23642
Total Users : 36235
Views Today : 57
Total views : 71160