” पंचगंगा घाट पर पांच तीर्थों का वास, गंगा स्नान के बाद श्रीहरि स्वरूप बिंदु माधव के दर्शन का विधान “

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बनारस की बसावट के लिहाज से शहर के उत्तरी छोर से गंगा की विपरीत धारा में चलें तो आदि केशव व राजघाट के बाद पंचगंगा प्रमुख घाट आता है जहां विराजमान है हरि भगवान विष्णु बिंदु माधव के रूप में। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु ने ऋषि अग्निबिंदु को वरदान देते समय यह कहा था कि सतयुग में उन्हें आदि माधव, त्रेता युग में उन्हें आनंद माधव, द्वापर युग में माधव एवं कलयुग में उन्हें बिन्दु माधव नाम से जाना जाएगा। धार्मिकता-अध्यात्मिकता के दृष्टिगत खास इस घाट की काशी के पंच तीर्थों में मान्यता है तो इसे पंचनद तीर्थ भी कहा जाता है।

वर्ष पर्यन्त गंगा के पवित्र घाटों पर डुबकी के लिए श्रद्धालु उमड़ते हैं लेकिन पंचनदतीर्थ (पंचगंगा) स्नान की विशेष महत्ता है। माना जाता है कि यहां ताप-पाप नाशक पांच नदियों यथा गंगा, यमुना, विशाखा, धूतपापा और किरणा का संगम होता है। ऐसे में यहां स्नान से हर तरह के पापों का शमन होता है। पुराणों में भी वर्णन है कि पंचनद तीर्थ में स्वयं तीर्थराज प्रयाग भी कार्तिक मास में स्नान करते हैं। मान्यता है कि शिव की नगरी में कार्तिक माह भगवान विष्णु के नाम होता है। शरद पूर्णिमा की रात वैभव लक्ष्मी की आराधना से शुरू स्नान उत्सव पूरे माह चलता है। स्नान के बाद पंचगंगा घाट पर हरि स्वरूप बिंदु माधव के दर्शन का विधान है। पितरों की राह आलोकित करने के लिए कार्तिक के पहले ही दिन से ही मासपर्यत आकाशदीप जलाए जाते हैं।

पंचगंगा घाट पर इनकी आभा निराली होती है। इसकी प्राचीनता का अंदाज श्रीमठ में स्थापित हजारे से लगाया जा सकता है। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने वर्ष 1780 में लाल पत्थरों से इसका निर्माण कराया था। इस क्षेत्र को काशी में अवस्थित सप्तपुरियों में कांचीपुरी क्षेत्र माना गया है। 14वीं -15 वीं शताब्दी में वैष्णव संत रामानंद इस घाट पर ही निवास करते थे। गंगा के इस तट से ही उन्होंने काशी में राम भक्ति को आंदोलन का रुप दिया। घाट की पथरीली सीढियों पर कबीर को गुरु मंत्र प्रदान किया और रामभक्ति की सगुण के साथ ही निर्गुण धारा को प्रवाह दे दिया।

घाट पर भी रामानंद संप्रदाय की मूल पीठ श्रीमठ स्थित है। खास यह की इस मठ के आशीषों से सींच कर ही बनारस को देव दीपावली महोत्सव सौगात में मिला। इसकी शुरूआत कार्तिक के पहले दिन आकाशदीप प्रज्जवलन से होती है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार रघुनाथ टण्डन ने 1580 में इस घाट का पक्का निर्माण कराया। भगवान विष्णु का मंदिर होने के कारण तब इसे बिंदुमाधव घाट कहा जाता था। सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में आमेर ( राजस्थान ) के राजा मान सिंह ने भगवान बिंदु माधव मंदिर का निर्माण कराया था।

इसे बाद में औरंगजेब द्वारा नष्ट कर आलमगीर मस्जिद का रूप दे दिया गया और घाट का नाम पंचगंगा कहा जाने लगा। घाट की सीढिय़ों पर मठ – मंदिर श्रृंखला में मठ के साथ ही तैलंग स्वामी मठ का भी नाम आता है। उन्नीसवीं शताब्दी में महान संत तैलंग स्वामी यहां निवास करते थे।

मठ में उनके हाथों स्थापित लगभग पचास मन भार का शिवलिंग भी पूजित है। घाट पर बिंदु विनायक, राम मंदिर (कंगन वाली हवेली), राम मंदिर (गोकर्णमठ), रामानंद मंदिर, धूतपापेश्वर (शिव), रेवेन्तेश्वर (शिव) मंदिर आदि प्रमुख हैं। घाट पर कार्तिक शुल्क एकादशी से पूर्णिमा तक पंचगंगा स्नान का मेला लगता है। स्नानोपरांत श्रद्धालु जन मिट्टी से निर्मित भीष्म प्रतिमा का पूजन करते हैं । घाट के महात्म्य को देखते हुए 1965 में सरकार ने निचले भाग को भी पक्का कर दिया।

 

रिपोर्ट विजयलक्ष्मी तिवारी

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