चकिया (चंदौली):
शिक्षा को लेकर सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। चकिया विकासखंड के साड़ाडीह स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय में जो तस्वीर सामने आई है, उसने पूरे शिक्षा तंत्र की पोल खोल दी है।निर्धारित
समय पर नहीं खुलता स्कूल, 7 शिक्षक निर्धारित समय के बाद तक नदारद
स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, विद्यालय में तैनात सात शिक्षक निर्धारित समय के काफी देर बाद तक स्कुल नहीं पहुंचे। हालत यह है कि कई दिनों से विद्यालय समय पर खुलना तक सुनिश्चित नहीं हो पा रहा। मासूम बच्चे स्कूल गेट पर घंटों इंतजार करते हैं, लेकिन जिम्मेदारों को कोई फर्क नहीं पड़ता।
👉 जनप्रतिनिधि के क्षेत्र में ही बदहाल शिक्षा व्यवस्था
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह विद्यालय क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि कैलाश आचार्य के क्षेत्र में आता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब सत्ता के केंद्र के पास ही शिक्षा व्यवस्था इतनी लचर है, तो दूरदराज इलाकों की स्थिति कितनी भयावह होगी?
👉 राजनैतिक संरक्षण या सिस्टम की कमजोरी?
ग्रामीणों का आरोप है कि शिक्षकों को कहीं न कहीं राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते उन पर कार्रवाई नहीं हो पाती। शिकायतें बार-बार की जाती हैं, लेकिन अधिकारी केवल कागजी खानापूर्ति कर मामले को दबा देते हैं।
बच्चों के भविष्य से सीधा खिलवाड़
इस लापरवाही का सबसे बड़ा खामियाजा उन गरीब बच्चों को भुगतना पड़ रहा है, जिनके पास निजी स्कूलों का विकल्प नहीं है। सरकारी स्कूल ही उनके सपनों की एकमात्र उम्मीद हैं, लेकिन जब वही व्यवस्था चरमराने लगे, तो भविष्य अंधकारमय होना तय है।
अभिभावकों में उबाल, कार्रवाई की मांग तेज
गांव के अभिभावकों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि शिक्षक न समय से आते हैं, न ही पढ़ाई को लेकर गंभीर हैं। कई बार शिकायत करने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।
👉 अब बड़ा सवाल — क्या जागेगा शिक्षा विभाग?
क्या दोषी शिक्षकों पर सख्त कार्रवाई होगी?
क्या शिक्षा विभाग इस मामले को गंभीरता से लेगा?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
👉 सुधार के लिए जरूरी कदम
अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था में दिखावे नहीं, बल्कि सख्ती दिखाई जाए—
✔️ बायोमेट्रिक उपस्थिति अनिवार्य हो
✔️ नियमित औचक निरीक्षण हो
✔️ शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई होलापरवाह शिक्षकों पर सस्पेंशन/ट्रांसफरनिष्कर्ष:
साड़ाडीह का यह मामला सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए आईना है। अगर अब भी सुधार नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ी इसकी बड़ी कीमत चुकानी पडेगी।











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