एक बुज़ुर्ग अपने हाथों में जल लेकर माथे से लगाते हैं। पास खड़ा एक नाविक धीरे से कहता है, “अब फर्क दिखता है… पानी पहले जैसा नहीं रहा।”
यह फर्क सिर्फ देखने का नहीं, बल्कि समझने का है। और इसे समझने के लिए इस पूरी यात्रा को पीछे जाकर देखना पड़ेगा जहाँ से बदलाव शुरू हुआ। साल 2014-15 में जब नमामि गंगे कार्यक्रम की शुरुआत हुई, तब गंगा की कहानी सिर्फ आस्था की नहीं, चुनौती की भी थी। लक्ष्य सिर्फ सफाई नहीं था, बल्कि माँ गंगा को उनकी मूल अवस्था में वापस लाना था, उनकी धारा को अविरल बनाए रखना, पानी को निर्मल करना और उनके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करना था। यही कारण है कि इस कार्यक्रम को समय के साथ विस्तार देते हुए आगे बढ़ाया गया।
इस दौरान काम एक-एक परत में आगे बढ़ा। फरवरी 2026 तक 43,030 करोड़ रुपये की लागत से 524 परियोजनाएँ स्वीकृत की गईं, जिनमें से 355 परियोजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। इन परियोजनाओं में सीवेज उपचार, नदी तट विकास, ई-फ्लो सुनिश्चित करना, ग्रामीण स्वच्छता, जैव विविधता संरक्षण, वृक्षारोपण और जनभागीदारी जैसे कई आयाम शामिल रहे।
लेकिन इस पूरी कहानी को समझने के लिए गंगा के बाहर भी नज़र डालना जरूरी है। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के तहत देश की अन्य नदियों पर भी समानांतर रूप से काम हुआ। 17 राज्यों के 100 शहरों में फैली 58 नदियों को कवर करते हुए 8,970.51 करोड़ रुपये की परियोजनाएँ लागू की गईं और 3,019 एमएलडी की सीवेज उपचार क्षमता विकसित की गई। नालों के इंटरसेप्शन और डायवर्जन, सीवरेज नेटवर्क का निर्माण और घाट निर्माण जैसे कार्यों ने इस व्यापक प्रयास को मजबूत किया।
गंगा की सफाई की सबसे बड़ी चुनौती शहरों से निकलने वाला गंदा पानी था। इसी को ध्यान में रखते हुए 35,794 करोड़ रुपये की लागत से 218 सीवेज अवसंरचना परियोजनाएँ शुरू की गईं, जिनकी कुल क्षमता 6,610 मिलियन लीटर प्रतिदिन है। इनमें से 138 परियोजनाएँ, 4,050 एमएलडी क्षमता के साथ, पूरी होकर संचालित हो रही हैं। यह केवल ढांचा नहीं है बल्कि एक ऐसी व्यवस्था है जिसने गंदे पानी के प्रवाह को गंगा तक पहुंचने से पहले ही रोकना और साफ करना शुरू किया।
इसके साथ ही, गंगा को सिर्फ साफ करने तक सीमित न रखकर उसे लगातार समझने और मॉनिटर करने की व्यवस्था भी बनाई गई। एक ऑनलाइन डैशबोर्ड के माध्यम से जल गुणवत्ता और सीवेज उपचार संयंत्रों के प्रदर्शन की निगरानी की जा रही है। 2018 में अधिसूचित न्यूनतम ई-फ्लो मानदंडों को लागू किया गया, जिससे नदी में निरंतर पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित हुआ। केंद्रीय जल आयोग इस अनुपालन की नियमित निगरानी करता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड गंगा की मुख्य धारा के पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में 112 स्थानों पर नियमित रूप से जल गुणवत्ता की निगरानी करता है।
वर्ष 2025 के जनवरी से अगस्त तक के आंकड़े इस बदलाव की एक स्पष्ट और भरोसेमंद तस्वीर सामने रखते हैं। गंगा का pH और घुलित ऑक्सीजन (DO), जो नदी की सेहत के सबसे महत्वपूर्ण संकेतक हैं, सभी स्थानों पर स्नान के मानकों के अनुरूप पाए गए हैं। यह इस बात का संकेत है कि नदी का मूल जैविक संतुलन काफी हद तक बहाल हो रहा है।
हालांकि जब जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) के आधार पर स्थिति को देखा जाता है, तो एक और स्तर सामने आता है। उत्तराखंड, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में गंगा का अधिकांश भाग अब मानकों के अनुरूप है, लेकिन कुछ खंड ऐसे हैं जहाँ अभी भी सुधार जारी है। फर्रुखाबाद से पुराना राजापुर (कानपुर), डलमऊ (रायबरेली) और उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर से तारीघाट (गाजीपुर) तक का हिस्सा, इन क्षेत्रों में BOD के स्तर अभी पूरी तरह संतुलित नहीं हुए हैं। हालांकि इन क्षेत्रों में भी कुछ अपवाद हैं, जैसे वाराणसी के अपस्ट्रीम और संगम के बाद गोमती तथा गाजीपुर के अपस्ट्रीम हिस्से, जहाँ स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है।
2018 और 2025 के बीच की तुलना यह दिखाती है कि कई प्रदूषित खंड समाप्त हुए या उनकी स्थिति में सुधार हुआ है। उत्तराखंड में हरिद्वार से सुल्तानपुर तक का खंड अब प्रदूषित सूची से बाहर हो चुका है। पश्चिम बंगाल में भी सुधार दर्ज किया गया है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में स्थिति बेहतर होने के बावजूद कुछ हिस्सों में अभी और काम किए जाने की आवश्यकता बनी हुई है।
गंगा की यह कहानी केवल पानी की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। इसके किनारों पर भी बदलाव दिखता है। लगभग 33,024 हेक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण किया गया, जिस पर लगभग 414 करोड़ रुपये खर्च हुए। उत्तर प्रदेश के सात जिलों मिर्जापुर, बुलंदशहर, हापुड़, बदायूं, अयोध्या, बिजनौर और प्रतापगढ़ में जैव विविधता पार्क विकसित किए गए, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में पाँच प्राथमिकता वाली आर्द्रभूमियों को भी संरक्षित और विकसित किया गया।
नदी के भीतर जीवन को पुनर्जीवित करने के लिए 203 लाख भारतीय मेजर कार्प फिंगरलिंग्स छोड़े गए, ताकि मछलियों और डॉल्फिन के लिए खाद्य श्रृंखला मजबूत हो सके और मछुआरों की आजीविका भी सुरक्षित रहे।
डॉल्फिन संरक्षण के लिए जनवरी 2026 में देश की पहली डॉल्फिन बचाव एम्बुलेंस शुरू की गई। अब तक 8 गंगा डॉल्फिन को बचाकर पुनः नदी में छोड़ा गया है। इसके साथ ही 250 किलोमीटर में फैला 100 स्वयंसेवकों का ‘सूंस साथी नेटवर्क’, 160 प्रशिक्षित कर्मी, 2000 समुदाय सदस्य और 15 डॉल्फिन क्लब इस प्रयास को मजबूत कर रहे हैं।
घड़ियालों और कछुओं के संरक्षण के लिए भी व्यापक प्रयास हुए। 22 नदियों में किए गए सर्वेक्षण में 3,037 घड़ियाल दर्ज किए गए, हालांकि केवल 5.6% ही उपयुक्त आवास में पाए गए, जो आगे के काम की दिशा भी दिखाता है। कछुओं की विभिन्न संकटग्रस्त प्रजातियों को रेडियो टैगिंग के साथ गंगा, यमुना और सरयू में छोड़ा गया। चंबल नदी में 387 घोंसलों (8,257 अंडों) की सुरक्षा से 7,979 नवजात कछुओं की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित हुई, जो 96.7% सफलता दर को दर्शाती है। चंबल के 210 किलोमीटर क्षेत्र में स्मार्ट-आधारित निगरानी के माध्यम से संरक्षण को तकनीकी आधार दिया गया।
उद्योगों के स्तर पर भी ठोस बदलाव दर्ज किया गया है। जाजमऊ, बंथर और मथुरा में कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट स्वीकृत किए गए, जिनमें से जाजमऊ और मथुरा की परियोजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। 2017 से शुरू हुई निगरानी के बाद BOD भार 26 टन प्रतिदिन से घटकर 2024 में 10.75 टन रह गया है। औद्योगिक अपशिष्ट का प्रवाह भी 349 एमएलडी से घटकर 265.56 एमएलडी हो गया है, जो लगभग 23.9% की कमी दर्शाता है।
गंगा को समझने और उससे जुड़े ज्ञान को साझा करने के लिए “गंगा नॉलेज पोर्टल” विकसित किया गया है, जिसमें 1,346 से अधिक दस्तावेज़, शोध पत्र, डेटा सेट और तकनीकी सामग्री उपलब्ध है।
वर्ष 2024-25 में 50 गंगा और 26 यमुना स्थलों पर की गई जैविक निगरानी में जल गुणवत्ता ‘अच्छी’ से ‘मध्यम’ श्रेणी में पाई गई। विभिन्न प्रकार के जलीय जीवों की उपस्थिति इस बात का संकेत देती है कि नदी की पारिस्थितिक क्षमता धीरे-धीरे पुनर्स्थापित हो रही है। और फिर इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा, जन-भागीदारी।
139 जिला गंगा समितियाँ बनाई गईं, जिन्होंने जनवरी 2026 तक 5,118 से अधिक बैठकों का आयोजन किया। गंगा टास्क फोर्स ने वृक्षारोपण, जनजागरूकता, जैव विविधता संरक्षण और घाटों पर गतिविधियों को आगे बढ़ाया। गंगा उत्सव, नदी उत्सव, स्वच्छता पखवाड़ा, सफाई अभियान, योग और आरती जैसे आयोजनों ने लोगों के बीच गंगा के प्रति जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किया। गंगा प्रहरी और गंगा विचार मंच जैसे समूह इस जुड़ाव को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं।
शाम ढलती है। घाट पर दीप जलते हैं और गंगा की लहरें उन्हें अपने साथ बहा ले जाती हैं।
यह दृश्य सदियों से वैसा ही है, लेकिन इस बार उसके पीछे एक नई कहानी है। एक ऐसी कहानी जिसमें प्रयास है, धैर्य है और धीरे-धीरे लौटता विश्वास है।
गंगा पूरी तरह बदल गई है, ऐसा कहना शायद अभी जल्दबाज़ी होगी। लेकिन यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं कि गंगा बदल रही है – लगातार, ठहराव के बिना, और सही दिशा में।









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