भारत के अंतर्मन का नाद: वन्देमातरम

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भारत के हज़ारों वर्षों के इतिहास में जब-जब राष्ट्रीय अस्मिता, सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक संकल्प की बात आई, तब-तब एक ऐसी ध्वनि गूंजी जिसने सोए हुए समाज में प्राण फूंक दिए। वह पावन ध्वनि है—’वंदे मातरम’। यह केवल बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से निकला एक गीत नहीं है, बल्कि यह भारत के अंतर्मन का नाद है। यह उस मातृभूमि का वंदन है जो अन्न, जल, वायु और संस्कारों से हमारा पोषण करती है।

जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और निराशा का अंधकार छाया था, तब ‘वंदे मातरम’ का यह उद्घोष स्वतंत्रता सेनानियों के लिए सबसे बड़ा संबल बना। फाँसी के फंदे को चूमते हुए अनगिनत हुतात्माओं के होठों पर यही एक शब्द था। इसने भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक हर भारतीय के हृदय में ‘एक भारत’ की प्राणवान अनुभूति को जगाया था।

प्रकृति, संस्कृति और मातृत्व का पावन संगम

‘सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्’ की यह वंदना हमें अपनी प्रकृति, अपनी नदियों, पर्वतों और वनों के प्रति कृतज्ञ होना सिखाती है। वंदे मातरम हमें याद दिलाता है कि भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक जीवंत मातृशक्ति है। जब हम अपनी धरती को ‘माता’ के रूप में स्वीकार करते हैं, तो हमारे भीतर उसके पर्यावरण की रक्षा, स्वच्छता और संरक्षण का स्वाभाविक दायित्व जागृत होता है।

वैचारिक स्पष्टता और कापुरुषता का नाश

वंदे मातरम का नाद मनुष्य के भीतर के भय, संशय और मानसिक दुर्बलता को समाप्त कर देता है। यह चेतना हमें सिखाती है कि अपनी सोच को अनुशासित रखें और व्यक्तिगत स्वार्थों के दायरे से बाहर निकलें। जब व्यक्ति के भीतर यह भाव जागता है, तो वह हर दिन खुद को तराशता है और अपने हुनर व सामर्थ्य को राष्ट्र के चरणों में समर्पित करता है। यही ऊर्जा हमारे चरित्र को मजबूत बनाकर एक अडिग आंतरिक स्थिरता देती है।

अंत्योदय और सामाजिक समरसता की शक्ति

मातृभूमि के अंतर्मन की पुकार यही है कि उसके सभी संतानों का जीवन सुखी, सम्मानित और अभावमुक्त हो। वंदे मातरम का वास्तविक गान केवल शब्दों के उच्चारण में नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के आंसू पोंछने और समरसता का वातावरण बनाने में है। जब हम जाति, भाषा और प्रांत के भेदों को मिटाकर ‘राष्ट्र प्रथम’ के भाव से कार्य करते हैं, तभी इस पावन मंत्र की सच्ची साधना होती है।

मंगलमान अभियान इसी पावन नाद और सांस्कृतिक स्वाभिमान को जन-जन के आचरण में उतारने का प्रयास है। जब समाज का हर नागरिक—चाहे वह शिक्षक हो, युवा हो, वैज्ञानिक हो या व्यापारी—अपने-अपने क्षेत्र में निष्काम भाव और पुरुषार्थ से जुटेगा, तब पूरे परिसर में सुमंगल की लहर फैलेगी। जब हर घर और हर मन से राष्ट्र-कल्याण का संकल्प निकलेगा, तभी ‘बड़ा मंगल’ घटित होगा।

आइए, भारत के इस अंतर्मन के नाद को अपने हृदय में पुनः जीवंत करें। अपनी मातृभूमि की गरिमा, संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध हों और अपने कर्मों से इस धरा को सुजलां-सुफलां बनाएं। जब हर भारतीय के कर्म में वंदे मातरम का भाव धड़केगा, तभी हमारा भारत विश्व पटल पर सुख, शांति और सामर्थ्य का परम प्रकाश फैलाएगा।

ध्येय वाक्य:

> “हर दिन मंगल हो, हर मंगल बड़ा मंगल हो, बड़ा मंगल से राष्ट्र मंगल हो।”

 

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

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