दिन-रात एक करके पढ़ाई करना, मां-बाप के पेट काटकर भेजे गए पैसों से कमरों का किराया देना और सालों-साल एक अदद नौकरी की उम्मीद में अपनी जवानी खपा देना—यह आज के आम छात्र की कड़वी हकीकत है। लेकिन जब यही छात्र परीक्षा केंद्र पहुंचता है या परीक्षा देकर बाहर निकलता है, तो उसे पता चलता है
कि उसकी सालों की मेहनत सोशल मीडिया पर चंद रुपयों में बिक चुकी है। ऐसे में आज देश का हर युवा और हर अभिभावक व्यवस्था से एक ही सुलगता हुआ सवाल पूछ रहा है कि आखिर कौन कर रहा है इन छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़? और आखिर कब तक होता रहेगा पेपर लीक का यह अंतहीन बौछार?
साल बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं और परीक्षाएं बदलती हैं, लेकिन नहीं बदलती तो परीक्षा से ठीक पहले या बाद में पेपर लीक होने की खबरें। देश का शायद ही कोई ऐसा राज्य या बड़ी परीक्षा बची है, जहां इस लीक तंत्र ने सेंध न लगाई हो। जो छात्र कड़ाके की ठंड और तपती गर्मी में लाइब्रेरी के चक्कर काटते हैं,
उनकी किस्मत का फैसला परीक्षा हॉल के बजाय चंद रसूखदार और पैसों के लालची लोग बंद कमरों में कर देते हैं। पेपर लीक होने के बाद जब परीक्षा रद्द होती है, तो सिर्फ एक एग्जाम कैंसिल नहीं होता,









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