​काशी की आध्यात्मिक विरासत का सम्मान: ‘संत नरहरी स्मृति द्वार’ के लिए शुभम सेठ ‘गोलू’ का संकल्प, प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की अपील

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​वाराणसी न्यूज़ :-

काशी, जो केवल एक शहर नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और ऋषियों-संतों की तपोभूमि है। आज अपनी एक महत्वपूर्ण धरोहर के सम्मान के लिए संघर्ष कर रही है। काशी की आध्यात्मिक परम्परा के अग्रदूत रहे ‘संत नरहरी जी’ के सम्मान में ‘संत नरहरी स्मृति द्वार’ की स्थापना की मांग एक जन -आंदोलन का रूप लेती जा रही है।

इस उद्देश्य के लिए लंबे समय से प्रयासरत सामाजिक कार्यकर्ता शुभम सेठ ‘गोलू’ ने अब इस भावना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष रखने का निर्णय लिया है। ​नीची बाग चौक जहाँ स्वर्णकारों और शिल्पकारों की मेहनत से काशी की पहचान पूरी दुनिया में चमकती है।

वहाँ संत नरहरी स्मृति द्वार की स्थापना केवल पत्थरों का निर्माण नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों की विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का एक संकल्प है। शुभम सेठ ‘गोलू’ का कहना है, “जब हम अपने संतों का सम्मान करते हैं, तभी हम अपनी संस्कृति को जीवित रखते हैं।

यह अत्यंत विचलित करने वाला है कि इतने समय से आग्रह करने के बावजूद इस दिशा में अब तक कोई सार्थक पहल नहीं हो सकी है।”​अपनी संस्कृति के प्रति गहरी आस्था और समर्पण के कारण शुभम सेठ ने 6 जनवरी को शांतिपूर्ण धरना दिया था और जल त्याग जैसे कठिन मार्ग को चुना था।

यह मात्र एक विरोध नहीं था, बल्कि काशी की माटी का वह दर्द था। जो अपनों को सम्मान न मिलने पर छलक उठा। जब काशी और देश के प्रधानमंत्री के आगमन की चर्चा है, तब काशीवासी इस उम्मीद में हैं कि उनकी यह पीड़ा और सांस्कृतिक मांग सीधे उन तक पहुँचेगी। शुभम सेठ ‘गोलू’ ने पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर प्रधानमंत्री से भेंट की अनुमति मांगी है, ताकि वे काशी की इस सामूहिक भावना को उनके सामने रख सकें।

​”हम केवल एक द्वार नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं के प्रति अपनी निष्ठा और श्रद्धा का प्रमाण चाहते हैं। विश्वास है कि न्यायप्रिय प्रशासन हमें हमारे आराध्य संत के सम्मान हेतु प्रधानमंत्री जी से संवाद का सुअवसर प्रदान करेगा,” शुभम सेठ ने भावुक होकर कहा।
​यह मांग केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस हर काशीवासी की है जो अपनी जड़ों से जुड़ाव महसूस करता है।

रिपोर्ट –  विवेक कुमार यादव 

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