आज के संक्रमण काल में,जब गौ-माता,विद्वान ब्राह्मणों जैसे सनातन धर्म प्रतीकों और निर्बल सनातनियों पर अत्याचार बढ़ रहे हैं,तब केवल शास्त्र-चर्चा पर्याप्त नहीं है।भगवान परशुराम के उस अमर संकल्प ‘गवां दुःखमपाकर्तुं शस्त्रं जग्राह भार्गवः’ को पुनर्जीवित करते हुए, परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती ‘१००८’ आज ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी’ (शं.च.) के गठन की प्रक्रिया प्रारम्भ करने की घोषणा करते हैं।यह सेना विशुद्ध रूप से गौ-ब्राह्मण जैसे धर्म-प्रतीकों की रक्षा और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े निर्बल सनातनी की सहायता हेतु समर्पित होगी।
अभय और अभिभावकत्व का संकल्प:
जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने यह मंगल कामना की है कि यह ‘चतुरंगिणी’ प्रत्येक सनातनी की ‘अभिभावक’ (Guardian) के रूप में कार्य करे।इसका मुख्य उद्देश्य हिन्दू समाज के भीतर से भय को समूल नष्ट करना है, ताकि किसी भी सनातनी को अन्याय का प्रतिकार करने और सत्य बोलने में तनिक भी संकोच या डर न लगे।जब समाज को यह विश्वास होगा कि उसके पीछे एक सुगठित और शास्त्र-शस्त्र संपन्न सैन्य बल खड़ा है,तभी वह निर्भय होकर धर्म-पथ पर अडिग रह सकेगा।
सैन्य पदानुक्रम एवं संरचना:
इस सेना का संचालन प्राचीन भारतीय सैन्य विज्ञान के आधार पर ९ स्तरीय पदानुक्रम में होगा।सैन्य संख्या बल के आधार पर इनके पदनाम क्रमशः पत्तिपाल,सेनामुखपति,गुल्मपति,गणपाल,वाहिनीपति,पृतनापति,चमुपति, अनीकिनीपति और महासेनापति होंगे।इन सभी अधिकारियों का अपना विशिष्ट सैन्य प्रोटोकॉल और उत्तरदायित्व होगा।संगठन के सर्वोच्च शिखर पर एक शं.च. परमाध्यक्ष होंगे,जिनके अधीन तीन शं.च.सर्वाध्यक्ष,सह सर्वाध्यक्ष और संयुक्त सर्वाध्यक्ष(पुरुष, स्त्री और तृतीय लिंग के प्रतिनिधि)
सामाजिक और धार्मिक संतुलन का कार्य करेंगे।
चतुरंगिणी के चार अंग और २० विभाग:
सेना की शक्ति को नियंत्रित और संचालित करने के लिए चार शं.च. अंगाध्यक्ष नियुक्त किए जाएंगे,जो क्रमशः मनबल,तनबल,धनबल और जनबल का नियंत्रण करेंगे।प्रत्येक अंगाध्यक्ष के अधीन ५-५ विशिष्ट विभाग (कुल २० विभाग) कार्यरत होंगे।
* मनबल के अंतर्गत संत, विद्वान, पुरोहित, वकील (विधिक सहायता)और मीडिया विभाग बौद्धिक मोर्चे को संभालेंगे।
* तनबल के योद्धा मल्ल, लाठी,परशु,खड्ग और गन (शस्त्र संचालन)के माध्यम से प्रत्यक्ष रक्षा सुनिश्चित करेंगे।
•जनबल के अंतर्गत सार्वकालिक,वार्षिक,मासिक,साप्ताहिक और दैनिक श्रेणी के स्वयंसेवक धर्म-सेवा में संलग्न होंगे।
* धनबल की विशेष भूमिका सेना के पोषक आधार के रूप में होगी, जिसमें प्रकट दाता,अप्रकट दाता,भूमि,भवन और वस्तुदाता सम्मिलित हैं। विशेष टिप्पणी: धनबल के सदस्य प्रत्यक्ष सैन्य टुकड़ी (पत्ति) के अंग नहीं होंगे,बल्कि वे अंगाध्यक्ष के माध्यम से सेना के संचालन हेतु आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने वाले ‘पृष्ठ-स्तंभ’ के रूप में कार्य करेंगे।
इस सेना में सबसे बुनियादी कार्यकारी इकाई के रूप में पत्तिपाल पंजीकृत होंगे,जो १० योद्धाओं की टुकड़ी (मनबल,तनबल और जनबल के मिश्रण)का नेतृत्व करेंगे।
यह संगठन सनातन धर्म के आत्मसम्मान और रक्षा का ऐसा अभेद्य दुर्ग होगा,जो किसी भी आततायी को शास्त्र और शस्त्र दोनों की मर्यादा में उत्तर देने में सक्षम होगा। आज से पंजीकरण आरंभ हो रहा।










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