नए सत्र की शुरुआत होते ही प्राइवेट स्कूलों ने अभिभावकों की जेब पर फिर से डाका डाल दिया है।किताबों और कॉपियों के नाम पर खुल्लमखुल्ला लूट मची हुई है। सबसे शर्मनाक बात —साधारण कॉपियों पर स्कूल का नाम छपवाकर उन्हें बाजार में महंगा बेचा जा रहा है।बाजार में 10-15 रुपये की कॉपी स्कूल की “विशेष दुकान” पर 40-50 रुपये में थोपी जा रही है।
किताबों का पूरा सेट 4,000 से 13,000 रुपये तक पहुँच चुका है।यह कोई शिक्षा नहीं,यह तो साफ-साफ कमीशन का माफिया राज है।स्कूल प्रबंधन और कुछ लालची दुकानदार मिलकर हर साल नया एडिशन,नया सिलेबस या “स्कूल स्पेशल” कॉपी का ढोंग रचकर अभिभावकों को लूट रहे हैं।एक ही कक्षा में अलग-अलग स्कूलों में किताब-कॉपी का खर्च हजारों रुपये का फर्क दिख रहा है।

अभिभावक बार-बार सवाल कर रहे हैं —आखिर यह पढ़ाई का स्तर है या जेब काटने का धंधा?
महंगी किताब और नाम छपी कॉपी से बच्चे टॉपर बन जाएंगे?या यह सिर्फ अभिभावकों की मेहनत की कमाई को बर्बाद करने का तरीका है?शिक्षा का अधिकार अधिनियम साफ कहता है कि अभिभावक बाजार से सस्ती किताबें और कॉपियाँ खरीद सकते हैं।लेकिन स्कूल वाले व्हाट्सएप ग्रुप और सर्कुलर के जरिए “अधिकृत दुकान” का नाम डालकर खुलेआम दबाव बना रहे हैं।
यह लूट सिर्फ वाराणसी तक सीमित नहीं है।पूरे उत्तर प्रदेश और देश भर में प्राइवेट स्कूलों में यही कमीशन का खेल चल रहा है।NCERT जैसी सस्ती किताबों को दरकिनार कर प्राइवेट पब्लिशर्स की महंगी किताबें जबरन थोपी जा रही हैं।कॉपियों पर स्कूल का नाम प्रिंट कर दुकानदार मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।शिक्षा बच्चे का अधिकार है,लेकिन वाराणसी जैसे पवित्र शहर में इसे व्यापार बना दिया गया है।पढ़ाई के नाम पर यह खुला शोषण और लूट कितने दिनों तक चलेगी?










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